Tuesday, December 15, 2009

कशिश

उसे बचाए कोई कैसे टूट जाने से
ये मेरा दिल जो बाज ना आए फरेब खाने से।।
पड़ा है वक्त तो वो सहमा सहमा सा है
चिराग जो कभी बुझता ना था बुझाने से।।
ना जाने कितने चिरागों को मिल गई शोहरत
एक आफ्ताब के बेवक्त डूब जाने से।।
मैं जानता हूॅ बिखरने से बच गए कुछ लोग
ये फायदा तो हुआ मेरे टूट जाने से ।।
आसमा गिराता रहा उस पर बिजलियां हरसूं
ना जाने,क्या खता की साहिल के आशियाने ने।।
संदीप शर्मा साहिल

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