Thursday, December 24, 2009

आईने का सच


मैं
जब भी
खड़ा होता हूँ

आईने के सामने
मुङो लगता है
कि
आईना
सच नहीं कहता
क्योंकि
अगर वो सच कहता
तो निश्चिंत ही
मेरा प्रतिबिंब
आईने के भीतर इतना
बेदाग नहीं होता।
मैंने जिंदगी के हर
मोड़ पर
छल और कपट को
सहेजा है
अपनी झोली में।
झूठ की बिसात का बादशाह भी
मेरे सामने सिर झुकाता है,
और लोगो के चेहरों पर
होता है
छल का सिर्फ एक मुखौटा
पर मेरे इस चेहरे,पर
ना जाने कितने मुखौटे हैं
रंग-बिरंगे
जो पल-प्रतिपल
गिरगिट की तरह रंग बदलकर
छिपा देतें हैं मेरी असलियत
आईना कभी नहीं दिखा पाता
मेरे चेहरे की कुटील मुस्कान को
और
ना ही कभी उभरने देता है
उसके पीछे
के स्याह दागदार चेहरे को
क्या,आईना झूठ का पुलिंदा है्?
क्या,सचमुच आईना झूठ का पुलिंदा हैं..
शायद नहीं,
क्योंकि वो सीख

गया है
आज के चालबाज जमाने की
शतरंजी चालें
तभी तो
वो छिपा देता है
मेरी असलियत
और दिखाता है वही
जो सब देखना चाहते हैं
इसलिए
आईने में रहकर भी मैं नजर आता हूँ
हमेशा बेदाग
हमेशा उज्जवल
आईना सच कहता है
आईना हमेशा सच कहता है....
(संदीप शर्मा साहिल)



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