Tuesday, October 20, 2009

कुंवर बेचैन

अंगुलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे
उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से मैंने खुद रो के बहुत देर हँसाया था जिसे
छू के होंठों को मेरे मुझसे बहुत दूर गईवो ग़ज़ल मैंने बड़े शौक से गाया था जिसे
मुझसे नाराज़ है इक शख़्स का नकली चेहराधूप में आइना इक रोज़ दिखाया था जिसे
अब बड़ा हो के मेरे सर पे चढ़ा आता है अपने काँधे पे कुँअर हँस के बिठाया था जिसे

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