Wednesday, October 21, 2009

मेरा सफर है,जहां तक,मंजिल के निशान रहें
चलेंगे जब तलक , सिर पर आसमान रहे।
ऐसा नहीं कि कदमों तले ही मिल जाए मंजिल
मजा तो जब कि पैरों में कुछ थकान रहे।
उस शख्स की आंखों में देखा है मैंने शैतान
है वो अपना,लेकिन फिर भी सावधान रहे।
मुङो जमीन की गहराईयों ने दाब दिया
मैं चाहता था मेरे सर पर आसमान रहे।
खत्म हुआ रिश्तों का सफर दुश्मनी के बाद
मगर ये अदावत हमारे ही दरमियाँ रहे।
उसके कांपते होंठो के सवालों का जवाब देना है
ए खुदा सलामत मेरी जबान रहे।
मैं हारा तो जहां में हारेगी मुहब्बत साहिल
मेरी जीत में शामिल कुछ प्यार का सम्मान रहें।
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Tuesday, October 20, 2009

कुंवर बेचैन

अंगुलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे
उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से मैंने खुद रो के बहुत देर हँसाया था जिसे
छू के होंठों को मेरे मुझसे बहुत दूर गईवो ग़ज़ल मैंने बड़े शौक से गाया था जिसे
मुझसे नाराज़ है इक शख़्स का नकली चेहराधूप में आइना इक रोज़ दिखाया था जिसे
अब बड़ा हो के मेरे सर पे चढ़ा आता है अपने काँधे पे कुँअर हँस के बिठाया था जिसे